Prem Deh Ka – प्रेम देह का

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प्रेम देह का मिलन नहीं है, प्रेम दिलों का जुड़ना है
चोटी पर चढ़कर मैं सोचूँ, आगे बढूँ कि मुडना है ?
समझ मुझे समझाती है ये, रुक जाओ,गिर जाओगे,
प्रेम कह रहा, पंख पसारो, नीलगगन तक उड़ना है.. .

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